रायपुर। आधुनिकता की तेज रफ्तार में जहां छत्तीसगढ़ की अनेक पारंपरिक वस्तुएं और रीति-रिवाज धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं. जो उपकरण कभी हर घर की पहचान हुआ करते थे, अब मशीनों और मिक्सी- ग्राइंडर ने उनकी जगह ले ली है. ऐसे में पाटन का सोरी परिवार आज भी अपनी पुश्तैनी कला के जरिए परंपरा की लौ जलाए हुए है. सोरी परिवार पीढ़ियों से पत्थर तराशकर सील- लोढ़ा और जांता, मुसर तैयार करता आ रहा है. पाटन निवासी महेंद्र कुमार सोरी बताते हैं कि यह हुनर उन्हें अपने पुरखों से विरासत में मिला है. सुबह से शाम तक पूरा परिवार मेहनत से पत्थर तराशने के काम में जुटा रहता है. महेंद्र कहते हैं, इसी से घर चलता है. महेंद्र कुमार सोरी बताते हैं कि सील और लोढ़ा को मां-बेटे का प्रतीक माना जाता है. इसलिए इन्हें एक साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग दिया जाता है. मेहनत भरी निर्माण प्रक्रिया सील बनाने के लिए विशेष प्रकार का पत्थर मंगवाया जाता है, जो महासमुंद और डोंडी लोहारा क्षेत्र से आता है. पहले पत्थर को काटा जाता है, फिर छैनी-हथौड़े से तराशकर आकार दिया जाता है. एक सील तैयार करने में लगभग एक से दो घंटे का समय लगता है. इसकी कीमत 1000 से 1500 रुपए तक होती हैं. फेरी लगाकर बेचते हैं उत्पाद महेंद्र गांव-गांव फेरी लगाकर अपने उत्पाद बेचते हैं. पाटन के अलावा अभनपुर, रायपुर, भिलाई और धमतरी सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में भी उनकी पहुंच है.
विवाह संस्कार में विशेष महत्व
छत्तीसगढ़ी परंपरा में सील- लोढ़ा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. विवाह संस्कार में टीकावन के रूप में सील देना शुभ माना जाता है. स्थानीय पुजारी पं. सुरेश सावर्णी के अनुसार, बड़े विवाह संस्कारों में भांवर की रस्म के दौरान भी सील का प्रतीकात्मक उपयोग किया जाता है.

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